वर्चस्व की लड़ाई में भड़की हिंसा की बलि चढ़े बेकसूर लोग

वर्चस्व की लड़ाई में छोटी-मोटी घटनाएं तो अक्सर होती रहती थीं. लेकिन अचानक इन छोटे से गांव में इतनी बड़ी घटना हो जाएगी और उसके बदले आठ लोगों को जिंदा जला कर मार दिया जाएगा, इसकी कल्पना तक किसी ने नहीं की थी.पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले करीब सौ परिवारों वाले बगटूई गांव का नाम भी मंगलवार से पहले शायद लोगों ने नहीं सुना होगा. लेकिन अब तृणमूल कांग्रेस के एक उप-प्रधान की हत्या और कथित रूप से उसका बदला लेने के लिए 8-10 घरों में लगाई गई आग में झुलस कर आठ लोगों की मौत ने इसे रातों रात सुर्खियों में ला दिया है. गांव के एक व्यक्ति नाम नहीं छापने की शर्त पर बताते हैं, “सोमवार शाम को भादू की हत्या के बाद ही गांव का चेहरा बदल गया था. लेकिन रात को जो कुछ हुआ उसकी किसी ने कल्पना तक नहीं की थी.” मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कल करेंगी मौके का दौरा, कहा कि किसी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा. सुबह मौके पर पहुंचे सीपीआईएम के प्रदेश सचिव मोहम्मद सलीम ने आरोप लगाया है कि एसआईटी सबूत मिटाने का प्रयास कर सकती है. कलकत्ता हाईकोर्ट ने घटना का संज्ञान लेते हुए इसे बेहद हैरान करने वाला बताया. कई जनहित याचिकाएं भी दायर हुई हैं. अब इन घटनाओं के बाद यह गांव राजनीति का अखाड़ा बन गया है और खासकर विपक्षी दल अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने में जुट गए हैं. दूसरी ओर, राज्यपाल जगदीप धनखड़ और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी इस मुद्दे पर आमने-सामने हैं. बंगाल में बीते करीब 11 साल में यह पहला मौका है जिसमें एक साथ इतने लोगों की मौत हुई है. इससे पहले सात मार्च, 2011 को पश्चिम मेदिनीपुर के नेताई में एक साथ नौ लोगों की हत्या हुई थी. अब इस घटना के बाद इलाके के तमाम पुरुष पुलिस और जवाबी हमले के डर से गांव छोड़ कर फरार हो गए हैं. हालांकि पुलिस प्रशासन ने इसकी पुष्टि नहीं की है. राज्य सरकार ने इस घटना की जांच के लिए विशेष कार्यबल (एसआईटी) का गठन कर दिया है. इसमें सीआईडी के एडीजी ज्ञानवंत सिंह के अलावा पश्चिमी रेंज के एडीजी संजय सिंह और सीआईडी के डीआईजी मिराज खालिद शामिल हैं. इस घटना के बाद त्वरित कार्रवाई करते हुए रामपुरहाट के ओसी त्रिदीप प्रामाणिक और एसडीपीओ सायन अहमद को उनके पद से हटा दिया गया है. केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इस मामले पर राज्य सरकार से रिपोर्ट मांगी है.

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