कोई पच्चीस साल पहले, यही यूनान (ग्रीस) था. यही समंदर था और इसी तरह का एक जहाज़ था. जहाज़ में ज़्यादातर पाकिस्तानी और बांग्लादेशी सवार थे. गिनती कभी किसी ने पूरी नहीं की, लेकिन 150-200 लोग डूब गए. जो 50-60 लोग बचे वो यूनान के छोटे से गांव के एक थाने में बंद थे. मैं रिपोर्टिंग करते हुए थाने के अंदर चला गया. अंदर जाकर पता चला कि जो बच गए हैं और उनमें जितने पाकिस्तानी हैं वे सभी पंजाबी भाई हैं कहानियां लगभग एक जैसी ही थीं. किसी के पिता ने ज़मीन का आखिरी टुकड़ा बेचकर, किसी की मां-बहन ने अपना ज़ेवर बेचकर तो कोई अपने दोस्त या रिश्तेदार से कर्ज़ लेकर जहाज़ पर चढ़ा था. यह सब इस उम्मीद में कि एक बार यूरोप पहुंच जाएंगे तो कर्ज़ भी उतर जाएगा और आने वाली पीढ़ियों की किस्मत भी चमक जाएगी. जिस दिन मैं लड़कों से मिला, उससे अगले दिन यूनान की सरकार को लड़कों को डिपोर्ट करना था. कुछ लड़के मुझे कोने में ले गए और कहने लगे कि भाई साहब अगर आप थाने के अंदर आ सकते हो ज़रूर आपकी कुछ न कुछ ऊपर तक पहुंच तो होगी. कुछ हमारी मदद कर दो. कुछ ऐसा कर दो कि हम पाकिस्तान वापस न जाकर यहीं कहीं रह जाएं. मैंने कहा कि यार मेरी इतनी जान पहचान तो नहीं है, आप लोग अल्लाह का शुक्र करो कि आप लोगों की जान बच गई है.