ईरान और अमेरिका के बीच जारी सीधा संघर्ष दुनिया को दहला रहा है, लेकिन इस बीच तेहरान की राजनीतिक व्यवस्था भी चर्चा का केंद्र बनी हुई है. खुद को इस्लामिक गणराज्य कहने वाला ईरान एक ऐसी अनोखी व्यवस्था पर टिका है जहां चुनाव और धार्मिक सत्ता का अद्भुत मिश्रण है. यहां राष्ट्रपति जनता द्वारा चुना तो जाता है, लेकिन वह देश का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति नहीं होता है. अयातुल्ला खामेनेई की मौत और नए नेतृत्व के उभार के बीच यह समझना जरूरी है कि आखिर वह कौन सा संविधान है जो राष्ट्रपति की मौजूदगी के बावजूद सारी ताकत एक धार्मिक नेता की मुट्ठी में बंद रखता है और राष्ट्रपति कौन-कौन से काम करते हैं.
ईरान की मौजूदा राजनीतिक संरचना 1979 की ईरानी क्रांति की कोख से निकली है. राजशाही खत्म होने के बाद एक ऐसा ‘हाइब्रिड सिस्टम’ बनाया गया जिसमें लोकतांत्रिक चुनाव तो हों, लेकिन उन पर धार्मिक नेतृत्व की कड़ी निगरानी बनी रहे. इस दोहरी व्यवस्था का मुख्य मकसद राजशाही की वापसी को रोकना और राजनीति में इस्लामी सिद्धांतों की सर्वोच्चता बनाए रखना था. यही कारण है कि यहां सरकार का चेहरा भले ही राष्ट्रपति हो, लेकिन रूह हमेशा सुप्रीम लीडर ही रहता है.