कर्पूरी ठाकुर के रास्ते पर ही खांटी ईमानदारी से चली है सुरेंद्र किशोर की लेखनी!

आज सुबह उठा तो पद्म सम्मानों की पूरी सूची पर निगाह गई. कई परिचित नाम दिखे पद्म भूषण की सूची में, डॉक्टर तेजस पटेल, पत्रकार कुंदन व्यास जैसे. कई बार इनसे मिलना हुआ, गुजरात में लंबा वक्त गुजारने के दौरान. बिहार के बिंदेश्वर पाठक का भी नाम देखा, जिन्हें मरणोपरांत पद्म विभूषण दिया गया है. सुलभ आंदोलन के जनक बिंदेश्वर पाठक से भी कई बार मिलना हुआ था. याद आया कि अपने खराब स्वास्थ्य के बावजूद वो मेरे अनुरोध पर स्वच्छता से जुड़े हुए नेटवर्क18 के एक कार्यक्रम में शामिल होने आए थे, इतनी मुहब्बत थी उन्हें सफाई और इससे जुड़े आंदोलन, प्रयासों से.
पद्म विभूषण और पद्म भूषण वाले नामों को पढ़ते- पढ़ते पद्म श्री पाने वालों की लिस्ट पर भी निगाह गई. और एक नाम पर ठहर गई. नाम सुरेंद्र किशोर का. लग सकता है कि काफी करीबी होंगे, इसलिए शायद. लेकिन ऐसा नहीं है. पिछले बीस- पचीस वर्षों में दो- तीन बार ही फोन पर बात हुई है. इन गिनी- चुनी बातचीत में भी आखिरी बातचीत कर्पूरी ठाकुर को लेकर, दो दिन पहले ही, जब मोदी सरकार ने उन्हें भारत रत्न देने की घोषणा की.
सुरेंद्र किशोर से आमने- सामने मिलना कभी नहीं हुआ. बिहार की राजधानी पटना में मैंने कभी लंबा काम भी नहीं किया, कभी पोस्टिंग नहीं रही, चुनावों के समय दो- चार दिन गुजारता था, वो भी रिपोर्टिंग के दिनों में. बिहार जन्मभूमि प्रदेश जरूर है, लेकिन कर्मभूमि गुजरात ही रही करीब डेढ़ दशक तक. गुजरात में सैकड़ों पत्रकारों और समाज जीवन के तमाम बड़े चेहरों को जानता हूं, लेकिन बिहार के गिने- चुने पत्रकारों को ही, समाज के बाकी हिस्से से परिचय और भी कम.

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