भारत द्वारा सिंधु जल समझौते को रद्द करने और पाकिस्तान के हिस्से की नदियों का पानी रोकने के फैसले ने दक्षिण एशिया में जल सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं. इस कदम का असर ऐसे समय में सामने आ रहा है जब अंतरराष्ट्रीय मौसम एजेंसियां पहले ही अल नीनो के कारण कम बारिश और सूखे जैसी स्थिति की आशंका जता चुकी हैं. ऐसे में पाकिस्तान के लिए हालात और भी चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं. पाकिस्तान की अधिकांश जनता को अपने सरकार की काली करतूतों का खामियाजा गंभीर जल संकट के तौर पर भुगतना पड़ सकता है. दूसरी तरफ, कम बारिश होने के बावजूद भारत के पास सरप्लस वॉटर रहने की संभावना है, जिसका इस्तेमाल खेतीबारी के साथ ही पेयजल के लिए भी किया जा सकेगा.
सिंधु जल समझौता (जो 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुआ था) दोनों देशों के बीच जल बंटवारे का आधार रहा है. इस समझौते के तहत भारत को पूर्वी नदियों (रावी, ब्यास और सतलुज) का उपयोग करने का अधिकार था, जबकि पश्चिमी नदियों (सिंधु, झेलम और चेनाब) का अधिकांश जल पाकिस्तान को मिलता रहा है. लेकिन अब भारत द्वारा समझौते को खत्म करने और पानी रोकने के संकेत से पाकिस्तान की कृषि और पेयजल आपूर्ति पर बड़ा असर पड़ सकता है. पहलगाम में बर्बर आतंकवादी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल समझौते को ठंडे बस्ते में डालने का ऐलान किया था.