अमेरिकी साथ के बावजूद क्या खाड़ी देशों को है अपनी हिफ़ाज़त के लिए नई रणनीति की ज़रूरत?

मध्य-पूर्व में हाल ही में हुए युद्ध ने खाड़ी देशों की रक्षा प्रणाली की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. ये सवाल दुनिया की बड़ी सैन्य ताक़तों के साथ हुए रक्षा समझौतों के कारगर होने और इन देशों में विदेशी सैन्य ठिकानों की मेज़बानी पर उठे हैं.

ज़ाहिर तौर पर, अब तक जो समझौते थे वो तनाव को रोकने या खाड़ी देशों की हिफ़ाज़त करने के लिए पर्याप्त साबित नहीं हुए हैं. इसलिए रक्षा साझेदारी के व्यापक भविष्य पर प्रश्नचिह्न लग गए हैं. इसके बावजूद कि कई खाड़ी देशों के अमेरिका और पश्चिमी साझेदारों के साथ सुरक्षा समझौते हैं, इस युद्ध ने इन गठबंधनों पर निर्भरता की बजाय रक्षा विकल्पों की व्यापक समीक्षा करने के लिए मजबूर कर दिया है.

क़तर के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता माजिद अल-अंसारी ने हाल ही में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में संकेत दिया कि खाड़ी देशों को मौजूदा युद्ध के मद्देनज़र अपनी साझा क्षेत्रीय सुरक्षा प्रणाली का फिर से मूल्यांकन करने की ज़रूरत है. बीबीसी हिन्दी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि खाड़ी देशों की रक्षा साझेदारी, युद्ध के दौरान रक्षात्मक दृष्टि से प्रभावी साबित हुई है. उन्होंने आगे कहा कि मौजूदा ख़तरों से निपटने के लिए खाड़ी देशों को क्षेत्रीय समन्वय के स्तर पर एक जैसा रुख़ अपनाने की ज़रूरत है. माजिद अल-अंसारी के बयानों से पता चलता है कि सहयोगियों के साथ सैन्य समझौते रक्षात्मक रूप से सफल रहे हैं, लेकिन केवल सहयोगियों पर निर्भर रहना नाकाफ़ी है. और भविष्य में किसी भी ख़तरे का साझे रूप से जवाब देने के लिए खाड़ी के देशों के बीच समन्वय को मज़बूत किया जाना चाहिए.

 

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